दिव्यता यी प्रचंड भयी है वही ढपालीपुरवा मा।

जैसा कि सर्वविदित है इस कोरोनाकाल  में लगभग समस्त बाह्य गतिविधियां ठप्प पड़ी हैं। ऐसे में अंचल के साहित्यकारगण द्वारा विभिन्न अनूठे पहल किये गये हैं ।
 जिनसे वैयक्तिक, चारित्रिक , सृजनात्मक और व्यक्तिगत विकास को बल मिलता हो। समय के सदुपयोग को ध्यान में रखते हुए ऐसी ही एक पहल क्षेत्र के नवयुवक कलमकार नितेश दिव्य ने  की है।
नितेश एक ऊर्जावान रचनाकार हैं और नगर के ही एक कॉलेज से शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं । पूर्व में नितेश की रचनाएं अवधी पंच आदि में प्रकाशित हो चुकी हैं। अपनी मित्रमंडली में
 अपनी चुटकुलेबाजियों , चंचलता, हंसमुख और खुले स्वभाव के लिए पहचाने जाने वाले नितेश का सम्बन्ध ढपालीपुरवा से बहुत घनिष्ठतम् रहा हैं और अपने अनुभव एवं कुछ घटित घटनाओं को आधार बनाकर मनोविनोद से भरपूर ढपालीपुरवा केन्द्रित एक अवधी खंडकाव्य लिख रहे हैं। जिस पर वरिष्ठ साहित्यकारों नें भी प्रशंसा व्यक्त की है।

नितेश ने समय का सदुपयोग करते  हुए पहले लाकडाउन में ही मित्रवर अतुल वरदान ,रवि विख्यात एवं शिवनाथ शिखर के साथ मिलकर एक ऑनलाइन साहित्यिक संगठन दिव्य-वरदान काव्यकुञ्ज की भी स्थापना की थी , जो निरन्तर साहित्यसेवा को अग्रसर है ।
नितेश दिव्य कहते हैं - 
"हम तौ खोलब आपन ढाबा , वही ढपालीपुरवा मा ।
करिब जोर कय शोर शराबा , वही ढपालीपुरवा मा ।
हम का जानी मन्दिर मस्जिद, बस उनहिन का पूजित है,,
हमरा है काशी औ काबा , वही ढपालीपुरवा मा ।।
खड़ी दुपहरी ठंड भयी है , वही ढपालीपुरवा मा ।
दिव्यता यी प्रचंड भयी है , वही ढपालीपुरवा मा ।
कइसे भूलि सकित है हम , तुमरे वी यार मुहल्ला का ,,
जिनगी हमरी झंड भयी है , वही ढपालीपुरवा मा ।।"